नवरात्रि के चौथे दिन माँ कुष्मांडा की कथा , आरती

नवरात्रि के चौथे दिन माँ कुष्मांडा की कथा , आरती

नवरात्रि के चौथे दिन माँ कुष्मांडा की पूजा और उपासना का विधान है। शास्त्रों में इन्हें आदि-शक्ति और सृष्टि की आद्य-स्वरूपा माना गया है, क्योंकि जब ब्रह्मांड का अस्तित्व नहीं था और चारों ओर केवल घना अंधकार व्याप्त था, तब इन्हीं देवी ने अपनी ‘ईषत’ यानी मंद मुस्कान से इस सृष्टि की रचना की थी। कुष्मांडा शब्द का अर्थ ही इनके सामर्थ्य को दर्शाता है—’कु’ का अर्थ है छोटा, ‘उष्म’ का अर्थ है ऊर्जा और ‘अंड’ का अर्थ है वह ब्रह्मांडीय अंडा जिससे यह संपूर्ण जगत उत्पन्न हुआ है। जब हम सृष्टि की उत्पत्ति के रहस्यों को देखते हैं, तो विभिन्न पुराणों में इसके अलग-अलग सुंदर वर्णन मिलते हैं। विष्णु पुराण में जहाँ भगवान विष्णु के संकल्प और उनके नाभिकमल से ब्रह्मा के प्रकट होने की बात कही गई है, वहीं शिव पुराण में महादेव को आदि-कारण माना गया है। माँ कुष्मांडा की यह कथा इन सभी मतों को एक सूत्र में पिरोती है। वास्तव में, माँ कुष्मांडा वह ‘परम ऊर्जा’ (Param Shakti) हैं, जो भगवान विष्णु के भीतर ‘पालन’ की शक्ति बनकर स्थित हैं और महादेव के भीतर ‘इच्छाशक्ति’ बनकर विराजमान हैं। इनके बिना न तो विष्णु जी संसार का संचालन कर सकते हैं और न ही ब्रह्मा जी सृजन।

माँ कुष्मांडा का निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है। यह एक अत्यंत गूढ़ और वैज्ञानिक तथ्य है कि सूर्य की वह प्रचंड तपन और चमक, जो पूरे सौरमंडल को ऊर्जा देती है, उसे सहने और नियंत्रित करने की शक्ति केवल माँ कुष्मांडा में ही है। सूर्य के भीतर रहकर वे ही दसों दिशाओं को आलोकित करती हैं और ब्रह्मांड की समस्त वस्तुओं व प्राणियों में जो तेज विद्यमान है, वह इन्हीं की छाया है। माँ की आठ भुजाएँ हैं, जो उनकी सर्वव्यापकता का प्रतीक हैं। उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र और गदा सुशोभित हैं। उनके आठवें हाथ में वह विशेष जपमाला है, जो भक्तों को सभी सिद्धियाँ और निधियाँ प्रदान करने वाली है। माँ का सिंह पर सवार होना यह दर्शाता है कि वे न केवल ममतामयी सृजनकर्ता हैं, बल्कि वे काल और भय पर भी पूर्ण विजय प्राप्त करने वाली शौर्य की अधिष्ठात्री हैं।

सृष्टि रचना की प्रक्रिया में माँ कुष्मांडा ने सबसे पहले अपनी चेतना से तीन प्रमुख देवियों—महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती को स्वरूप दिया। इन्हीं शक्तियों के माध्यम से त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का प्राकट्य हुआ और उन्हें जगत के निर्माण, पालन और संहार का उत्तरदायित्व सौंपा गया। इसलिए माँ कुष्मांडा को ‘शक्ति की जननी’ कहा जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से चौथे दिन की पूजा का संबंध ‘अनाहत चक्र’ से है, जो हमारे हृदय के केंद्र में स्थित है। जब साधक माँ कुष्मांडा का ध्यान करता है, तो उसके भीतर का संकुचित अहंकार समाप्त हो जाता है और उसे यह बोध होता है कि पूरा ब्रह्मांड एक ही सत्य की मुस्कान से उपजा है। माँ को कुष्मांड यानी पेठे की बलि प्रिय होने का प्रतीकात्मक अर्थ यही है कि हम अपनी जड़ता और अहंकार को माँ के चरणों में अर्पित कर दें। उनकी उपासना से न केवल शारीरिक और मानसिक व्याधियां दूर होती हैं, बल्कि भक्त को वह ओज और यश प्राप्त होता है जिससे उसका जीवन सूर्य की भाँति दैदीप्यमान हो उठता है। माँ कुष्मांडा वह आदि-मुस्कान हैं जिसने शून्यता को जीवन से भर दिया और आज भी वे ही कण-कण में प्राण बनकर धड़कती हैं।

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी
तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को
उज्ज्वल से दो नैना, चंद्र बदन नीको ॥

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै
रक्त पुष्प गल माला, कंठन पर साजै ॥

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी ॥

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती
कोटिक चंद्र दिवाकर, राजत सम ज्योति ॥

शुम्भ-निशुम्भ विदारे, महिषासुर घाती
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥

चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे ॥

ब्रह्माणी रुद्राणी, तुम कमला रानी
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥

चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू ॥

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता
भक्तन की दुख हरता, सुख संपत्ति करता ॥

भुजा चार अति शोभित, खड्ग खप्पर धारी
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती
श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति ॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी
तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥

माँ कूष्मांडा मूल मंत्र

ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥ -(इस मंत्र का जाप 108 बार करना सबसे अच्छा रहता है।)

बीज मंत्र

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कूष्माण्डायै नमः॥ (ये ज्यादा शक्तिशाली मंत्र है,  मन की शांति और ऊर्जा के लिए)

ध्यान मंत्र

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥

अर्थ :
माँ कूष्मांडा हमें सुख, शक्ति और शुभ फल दें

कैसे जाप करें (simple)

  • सुबह या शाम

  • दीपक जलाकर

  • 11 / 21 / 108 बार जाप

 आसान तरीका (best)

 1 बार ध्यान मंत्र
 108 बार बीज मंत्र

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