नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की संपूर्ण कथा

नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की संपूर्ण कथा

नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की उपासना की जाती है। यह स्वरूप माँ पार्वती के विवाह के पश्चात का स्वरूप है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, इसी कारण इन्हें ‘चंद्रघंटा’ कहा जाता है।

माँ का दिव्य विग्रह:

  • वर्ण (रंग): इनका शरीर स्वर्ण के समान चमकीला है।

  • भुजाएँ: माँ की दस भुजाएँ हैं। इन हाथों में खड्ग, धनुष-बाण, त्रिशूल, गदा, तलवार, कमंडल और कमल का फूल जैसे शस्त्र और शास्त्र सुशोभित हैं।

  • मुद्रा: माँ हमेशा युद्ध के लिए तत्पर मुद्रा में रहती हैं, परंतु उनके मुख पर अपार शांति और सौम्यता है।

  • वाहन: इनका वाहन सिंह (शेर) है, जो निर्भयता का प्रतीक है।


अध्याय 2: पौराणिक पृष्ठभूमि – शिव-पार्वती विवाह का प्रसंग

माँ चंद्रघंटा की कथा वास्तव में महादेव और माता पार्वती के विवाह के उस अलौकिक क्षण से जुड़ी है, जब शिव जी अपना वीभत्स रूप छोड़कर मनभावन स्वरूप धारण करते हैं।

जब माता पार्वती (शैलपुत्री/ब्रह्मचारिणी) की कठिन तपस्या सफल हुई, तब भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। राजा हिमालय के घर विवाह की तैयारियाँ होने लगीं। भगवान शिव अपनी बारात लेकर पहुँचे। महादेव की बारात अत्यंत विचित्र थी— उनके साथ भूत, प्रेत, पिशाच, अघोरी और नंदी-भृंगी जैसे गण थे। स्वयं महादेव के गले में सांप, शरीर पर भस्म और सिर पर जटाएं थीं।

जब यह बारात हिमालय के द्वार पर पहुँची, तो माता पार्वती की माता ‘मैना’ और अन्य स्त्रियाँ डर के मारे मूर्छित होने लगीं। महल में भय व्याप्त हो गया। तब माता पार्वती ने परिस्थिति को संभालने के लिए अपना एक अत्यंत दिव्य और सौम्य रूप धारण किया, जिसे चंद्रघंटा कहा गया। उन्होंने महादेव से प्रार्थना की कि वे एक सुंदर राजकुमार का रूप धारण करें ताकि उनके परिजन भयभीत न हों। माँ के इसी रूप ने संसार को सिखाया कि शक्ति का प्रयोग केवल डराने के लिए नहीं, बल्कि संतुलन बनाने के लिए होता है।


अध्याय 3: महिषासुर का आतंक और माँ का प्राकट्य

माँ चंद्रघंटा की एक अन्य कथा उनके असुर-विनाशक रूप से जुड़ी है। प्राचीन काल में देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ा था। असुरों का स्वामी महिषासुर था और देवताओं के राजा इंद्र थे।

महिषासुर ने अपनी शक्ति के मद में चूर होकर देवताओं को पराजित कर दिया और स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। सभी देवता त्रस्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुँचे। देवताओं की करुण पुकार सुनकर त्रिदेवों के मुख से एक अत्यंत तेज (प्रकाश) प्रकट हुआ। वही तेज दसों दिशाओं में व्याप्त हो गया और उससे एक देवी का प्राकट्य हुआ।

भगवान शिव ने उन्हें अपना त्रिशूल दिया, विष्णु जी ने चक्र दिया, इंद्र ने अपना वज्र और घंटा दिया। देवी के मस्तक पर अर्धचंद्र चमकने लगा। जब देवी ने अपने हाथ के घंटे की भयानक ध्वनि की, तो उस गर्जना से असुरों के हृदय फटने लगे। वह ध्वनि इतनी प्रचंड थी कि महिषासुर की सेना में खलबली मच गई।


अध्याय 4: रणक्षेत्र और असुर संहार

महिषासुर ने अपनी विशाल सेना के साथ देवी पर आक्रमण किया। उसने अपनी माया से अनेक रूप धरे— कभी वह हाथी बनता, कभी भैंसा, तो कभी सिंह। परंतु माँ चंद्रघंटा, जो सिंह पर सवार थीं, उन्होंने अपनी दसों भुजाओं से प्रहार करना शुरू किया।

माँ के हाथों में स्थित खड्ग और बाणों ने असुरों का लहू बहा दिया। महिषासुर ने जब अपनी गदा से वार करना चाहा, तो माँ ने अपने त्रिशूल से उसके प्राण हर लिए। इस युद्ध में माँ के मस्तक पर स्थित ‘चंद्रमा’ से निकलने वाली किरणें और उनके ‘घंटे’ की ध्वनि शत्रुओं को भ्रमित कर रही थी। अंततः, माँ ने देवताओं को महिषासुर के आतंक से मुक्त कराया और धर्म की स्थापना की।


अध्याय 5: आध्यात्मिक और यौगिक महत्व

  • मणिपूर चक्र: योग शास्त्र के अनुसार, तीसरे दिन की साधना ‘मणिपूर चक्र’ (Navel Center) में होती है। यह चक्र साहस और शक्ति का केंद्र है। माँ चंद्रघंटा की कृपा से साधक के भीतर का भय समाप्त हो जाता है और उसे दिव्य सुगंध व ध्वनियों का अनुभव होने लगता है।

  • घंटे की ध्वनि का रहस्य: मंदिर में जो घंटा बजाया जाता है, वह माँ चंद्रघंटा का ही प्रतीक है। इसकी ध्वनि मन के नकारात्मक विचारों को नष्ट कर एकाग्रता बढ़ाती है।


अध्याय 6: माँ की महिमा और फलश्रुति

माँ चंद्रघंटा की पूजा करने से व्यक्ति को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  1. वीरता और निर्भयता: भक्त किसी भी संकट का सामना करने के लिए तैयार रहता है।

  2. सौम्यता: शक्ति होने के बावजूद व्यक्ति विनम्र बना रहता है।

  3. पापों का नाश: माँ के घंटे की ध्वनि भक्त के जन्म-जन्मांतर के पापों को जला देती है।

  4. ग्रह शांति: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, चंद्रघंटा की पूजा से शुक्र (Venus) ग्रह मजबूत होता है, जिससे जीवन में सुख-सुविधाएं बढ़ती हैं।


अध्याय 7: पूजन विधान और प्रिय वस्तुएँ

  • रंग: इस दिन सुनहरा (Golden) या पीला रंग पहनना अत्यंत शुभ है। यह माँ की आभा का प्रतीक है।

  • पुष्प: माँ को कमल और शंखपुष्पी के फूल बहुत प्रिय हैं।

  • भोग: माँ को दूध या दूध से बनी मिठाइयाँ (जैसे मखाने की खीर) का भोग लगाया जाता है।


॥ माँ चंद्रघंटा का सिद्ध मंत्र ॥

पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥

भावार्थ: श्रेष्ठ सिंह पर सवार और चण्ड (भयानक) कोप वाले शस्त्र धारण करने वाली, ‘चंद्रघंटा’ नाम से विख्यात देवी मुझ पर अपनी प्रसन्नता (कृपा) बरसाएं।


॥ माँ चंद्रघंटा की आरती ॥

जय माँ चंद्रघंटा सुख धाम। पूर्ण कीजो मेरे सभी काम। चंद्र समाज तू शीतल धात्री। शरण तुम्हारी आए हम यात्री। क्रोध को शांत करने वाली। भक्तों की लाज बचाने वाली। धनुष बाण हाथ में सोहे। ढाल तलवार मन को मोहे। घंटे की ध्वनि जो भी सुन पाए। असुर भागें और संकट जाए। सिंह वाहिनी माँ जय जगदम्बा। तेरी कृपा से मिटे विलंबा।

Adhaytmik