नवरात्रि के पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है। “शैल” का अर्थ होता है पर्वत और “पुत्री” का अर्थ है बेटी। इसलिए माँ शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री कहा जाता है। ये माँ दुर्गा का पहला स्वरूप हैं और नवदुर्गाओं में सबसे प्रथम स्थान रखती हैं।भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में ‘नवरात्रि’ केवल उत्सव नहीं, बल्कि अंतरात्मा की शुद्धि का महापर्व है। मार्कण्डेय पुराण के ‘देवी महात्म्य’ के अनुसार, देवी दुर्गा के नौ रूप जीवन के विभिन्न चरणों और ऊर्जाओं को दर्शाते हैं। नवरात्रि के प्रथम दिन जिस देवी की उपासना होती है, वे हैं— माँ शैलपुत्री।
इनका स्वरूप अत्यंत सौम्य और प्रभावशाली है। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल है, जो सत्व, रज और तम गुणों पर नियंत्रण का प्रतीक है, और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है, जो कीचड़ (संसार) में रहकर भी पवित्र रहने की प्रेरणा देता है। इनका वाहन वृषभ (बैल) है, जो धर्म और अचल भक्ति का प्रतीक है।
पूर्व जन्म का वृत्तांत – सती का प्राकट्य
माँ शैलपुत्री का पूर्व जन्म राजा दक्ष की पुत्री सती के रूप में हुआ था। राजा दक्ष एक बहुत ही घमंडी और अहंकारी राजा थे। उनकी पुत्री सती भगवान शिव की बहुत बड़ी भक्त थीं। सती ने अपने कठोर तप से भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया। हालांकि राजा दक्ष को भगवान शिव पसंद नहीं थे। उन्हें शिव का साधारण वेश, जटा-जूट और भस्म से सना शरीर अच्छा नहीं लगता था। वे चाहते थे कि उनकी पुत्री का विवाह किसी राजसी और ऐश्वर्यशाली व्यक्ति से हो, लेकिन सती ने अपने प्रेम और भक्ति से शिव को चुना। समय बीता और एक बार प्रजापति दक्ष ने अपनी राजधानी ‘कनखल’ (हरिद्वार) में एक अत्यंत विशाल यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ का उद्देश्य अपनी सत्ता का प्रदर्शन करना और शिव को नीचा दिखाना था। उन्होंने स्वर्ग के सभी देवताओं, ऋषियों, यक्षों और गंधर्वों को निमंत्रित किया, लेकिन जानबूझकर अपनी पुत्री सती और जमाता भगवान शिव को निमंत्रण नहीं भेजा।
कैलाश पर्वत पर बैठी सती ने जब देखा कि आकाश मार्ग से देवगण अपने विमानों में बैठकर उनके पिता के घर जा रहे हैं, तो उनका मन व्याकुल हो उठा। उन्होंने महादेव से कहा— “हे स्वामी! मेरे पिता के यहाँ उत्सव है। पुत्री को पिता के घर जाने के लिए किसी निमंत्रण की आवश्यकता नहीं होती। कृपया आप भी मेरे साथ चलें।”
महादेव ने मंद मुस्कान के साथ कहा— “देवी! बिना बुलाए जाना उचित नहीं है। दक्ष मुझसे द्वेष रखते हैं, वहां तुम्हारा अपमान होगा।” किंतु सती के बार-बार अनुरोध पर शिव जी ने उन्हें अपने गणों के साथ जाने की अनुमति दे दी।
सती का अपमान और योगाग्नि
जब सती यज्ञशाला पहुँचीं, तो वहां का वातावरण अत्यंत कटु था। उनके पिता दक्ष ने उनकी ओर देखा तक नहीं। उनकी माता को छोड़कर किसी भी बहन या संबंधी ने उनसे प्रेम से बात नहीं की। इतना ही नहीं, दक्ष ने भरी सभा में भगवान शिव का अत्यंत नीच और अपमानजनक शब्दों में तिरस्कार किया।
सती यह सब देख और सुन रही थीं। उन्हें बोध हुआ कि उनके पति की चेतावनी सत्य थी। जिस सभा में उनके आराध्य महादेव की निंदा हो रही थी, वहां जीवित रहना उन्हें पाप समान लगा। उन्होंने अत्यंत क्रोध और दुख में भरकर कहा—
“हे सभासदों! जिस शरीर ने शिव-निंदक दक्ष से जन्म लिया है, उस शरीर को मैं अब धारण नहीं करूँगी। यह देह अब इसी क्षण भस्म होगी।”
देवी सती ने पद्मासन लगाया और अपनी योग शक्ति से शरीर के भीतर अग्नि प्रज्ज्वलित की (योगाग्नि) और स्वयं को उसी क्षण भस्म कर दिया। यह देखते ही हाहाकार मच गया। जब यह समाचार कैलाश पहुँचा, तो महादेव ने अत्यंत क्रोध में अपनी एक जटा उखाड़ी जिससे वीरभद्र का जन्म हुआ।वीरभद्र ने यज्ञ को तहस-नहस कर दिया और राजा दक्ष का सिर काट दिया। बाद में देवताओं के निवेदन पर शिव जी का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने दक्ष को जीवनदान दिया, लेकिन बकरे का सिर लगाकर।
शैलपुत्री का जन्म और हिमालय की तपस्या
सती के देह त्याग के बाद पूरी सृष्टि शोक में डूब गई। माँ आदि शक्ति ने पुनः अवतार लेने का निश्चय किया। इस बार उन्होंने पर्वतराज हिमालय और माता मैना की पुत्री के रूप में जन्म लिया।
हिमालय, जो अडिगता और स्थिरता का प्रतीक हैं, उनके घर में जन्म लेने के कारण देवी का नाम शैलपुत्री पड़ा। इनका जन्म होते ही हिमालय पर्वत औषधियों और रत्नों से जगमगा उठा। बचपन से ही शैलपुत्री का मन भगवान शिव की भक्ति में लीन रहता था। उन्हें अपने पूर्व जन्म का आभास था।
नारद मुनि ने हिमालय के घर आकर बताया कि यह कन्या साक्षात जगदम्बा है और इसका विवाह पुनः शिव से ही होगा। तब शैलपुत्री ने शिव को पति के रूप में पाने के लिए वर्षों तक कठिन तपस्या की। इसी तपस्या के कारण उन्हें ‘ब्रह्मचारिणी’ भी कहा गया, लेकिन उनका प्रथम स्वरूप ‘शैलपुत्री’ ही रहा।

शैलपुत्री और पार्वती का संबंध
अक्सर भक्तों के मन में प्रश्न आता है कि क्या शैलपुत्री और पार्वती एक ही हैं? जी हाँ, माँ शैलपुत्री ही माता पार्वती का प्रारंभिक और सबसे शुद्ध स्वरूप हैं।
शैलपुत्री: वह रूप जो हिमालय की गोद में जन्मा और स्थिर बुद्धि का प्रतीक बना।
पार्वती: वह नाम जो ‘पर्वत’ से संबंधित होने के कारण प्रसिद्ध हुआ।
हेमवती: हिमालय का एक नाम ‘हेमवान’ भी है, इसलिए स्वर्ण जैसी आभा वाली देवी को हेमवती भी कहा गया।
शैलपुत्री माँ पार्वती के उस संकल्प का नाम है जो कभी डगमगाता नहीं। जैसे हिमालय अपनी जगह से नहीं हिलता, वैसे ही माँ शैलपुत्री का अपने शिव के प्रति प्रेम और भक्ति अटल है।
नवरात्रि के नौ रूप दरअसल देवी के जीवन के अलग-अलग पड़ावों को दर्शाते हैं।
-
शैलपुत्री: जब उन्होंने हिमालय के घर जन्म लिया।
-
ब्रह्मचारिणी: जब उन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या (ब्रह्मचर्य) की।
-
चंद्रघंटा: जब उनका भगवान शिव से विवाह हुआ और उन्होंने मस्तक पर आधा चंद्रमा धारण किया।
तो संक्षेप में, शैलपुत्री, सती का नया जन्म और पार्वती का ही प्रारंभिक स्वरूप हैं।
पूजन विधि और आध्यात्मिक रहस्य
नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना (घट स्थापना) के साथ माँ शैलपुत्री की पूजा होती है।
मूलाधार चक्र: योग मार्ग में माँ शैलपुत्री का स्थान ‘मूलाधार चक्र’ में माना गया है। यह चक्र मनुष्य के अस्तित्व का आधार है। जो भक्त इनकी पूजा करता है, उसकी आध्यात्मिक यात्रा का आधार (Base) मजबूत हो जाता है।
रंग और भोग: माँ को सफ़ेद रंग अत्यंत प्रिय है, जो पवित्रता और शांति का प्रतीक है। इन्हें गाय के शुद्ध घी का भोग लगाया जाता है, जिससे भक्त को रोगों से मुक्ति और आरोग्य प्राप्त होता है।
उपसंहार (निष्कर्ष)
माँ शैलपुत्री की कथा हमें सिखाती है कि चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि हमारा संकल्प हिमालय जैसा अडिग है, तो हम स्वयं ईश्वर को भी प्राप्त कर सकते हैं। सती से शैलपुत्री बनने की यह यात्रा “अहंकार के विनाश” (दक्ष का अंत) से “स्थिर भक्ति” (हिमालय की पुत्री) की ओर ले जाने वाली यात्रा है।
जो भी भक्त इस कथा को पढ़ता या सुनता है, उसके जीवन में स्थिरता आती है, भय का नाश होता है और वह अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्र होता है।
माँ शैलपुत्री की आरती ॥
शैलपुत्री माँ बैल पर सवार। करें देवता जय जयकार। शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी। पार्वती तू उमा कहलावे। जो तुझे सिमरे सो सुख पावे। ऋद्धि-सिद्धि प्रदान तू करती। भक्तों के सब कष्ट तू हरती। प्रथम नवरात्रि तेरा पूजन। शुद्ध भाव से करें तेरा अर्चन।
2nd
जय जय शैलपुत्री माता,
जय जय शैलपुत्री माता।
रूप अनूप तुम्हारा,
जग में नहीं समाता॥
पर्वत राज की बेटी,
शक्ति रूप तुम धारी।
तुम बिन कौन हमारे,
संकट हरनिहारी॥
जय जय शैलपुत्री माता…
त्रिशूल कमल धारी,
बैठी नंदी सवारी।
करुणा की हो धारा,
माँ तुम हो हमारी॥
जय जय शैलपुत्री माता…
भक्तों के दुःख हरती,
सुख-सम्पत्ति देती।
जो भी तुम्हें ध्याता,
मनवांछित फल लेती॥
जय जय शैलपुत्री माता…
दीनन की हो रक्षक,
संतों की तुम माता।
तेरी महिमा गावे,
सारा जग ये गाता॥
जय जय शैलपुत्री माता…
माँ शैलपुत्री मंत्र
ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः
इस मंत्र का जाप करने से जीवन में शांति और शक्ति प्राप्त होती है।
