नवरात्रि के द्वितीय दिवस पर देवी के जिस स्वरूप की उपासना की जाती है, वह है— माँ ब्रह्मचारिणी।
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ब्रह्म: इसका अर्थ है ‘तपस्या’ (Tapas)।
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चारिणी: इसका अर्थ है ‘आचरण करने वाली’।
अर्थात जो तप का आचरण करती हैं, वही ब्रह्मचारिणी हैं। इनके स्वरूप की बात करें तो माँ के दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल सुशोभित है। माँ अत्यंत शांत, भव्य और ज्योतिर्मय हैं। उनके मुख पर एक दिव्य ओज है जो वर्षों की साधना का फल है।
अध्याय 2: पूर्व प्रसंग और संकल्प
पिछले अध्याय में हमने पढ़ा कि माता सती ने देह त्याग के बाद हिमालय के घर ‘शैलपुत्री‘ के रूप में जन्म लिया। जब देवी बड़ी हुईं, तो उनके मन में अपने पिछले जन्म के स्वामी, भगवान शिव के प्रति प्रेम और भक्ति जाग्रत होने लगी।
एक दिन देवर्षि नारद हिमालय के राजभवन पधारे। उन्होंने देवी पार्वती की हस्तरेखाएँ देखीं और भविष्यवाणी की— “यह कन्या साक्षात शक्ति है। इसका विवाह महादेव से ही होगा, परंतु इसके लिए इन्हें घोर तपस्या करनी होगी।” नारद जी के वचनों को सुनकर देवी पार्वती ने मन ही मन निश्चय कर लिया कि वे शिव को ही पति के रूप में प्राप्त करेंगी, चाहे इसके लिए उन्हें युगों तक तप क्यों न करना पड़े।
अध्याय 3: वन गमन और कठिन तपस्या
अपने संकल्प को सिद्ध करने के लिए माता पार्वती राजसी ठाट-बाट त्याग कर वन की ओर प्रस्थान कर गईं। यहीं से उनके ‘ब्रह्मचारिणी’ स्वरूप का आरंभ हुआ। उनकी तपस्या की यात्रा तीन चरणों में विभाजित है, जो मनुष्य के धैर्य की परीक्षा लेती है:
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प्रथम चरण (हजार वर्ष): माँ ने केवल फल और फूल खाकर एक हजार वर्ष व्यतीत किए।
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द्वितीय चरण (सौ वर्ष): अगले सौ वर्षों तक उन्होंने केवल शाक-भाजी (सब्जियां) खाकर तपस्या की।
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तृतीय चरण (कठिन उपवास): इसके पश्चात उन्होंने धूप, वर्षा और कड़ाके की ठंड में खुले आकाश के नीचे रहकर घोर तप किया। उन्होंने केवल जमीन पर गिरे हुए ‘बिल्व पत्र’ खाकर अपना निर्वाह किया।
अध्याय 4: ‘अपर्णा’ नाम की सार्थकता
हजारों वर्षों की तपस्या के बाद एक समय ऐसा आया जब माँ ने उन सूखे बिल्व पत्रों को खाना भी त्याग दिया। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार (बिना भोजन-पानी) रहने के कारण उनका शरीर अत्यंत क्षीण (दुबला) हो गया।
चूँकि उन्होंने सूखे पत्ते (पर्ण) खाना भी छोड़ दिया था, इसलिए उनका एक नाम ‘अपर्णा’ पड़ा। माँ की यह दशा देख उनकी माता ‘मैना’ अत्यंत दुखी हुईं और उन्होंने करुणावश पुकारा— “उ मा!” (ओह! नहीं/बस करो)। माता के इसी संबोधन से उनका प्रसिद्ध नाम ‘उमा’ पड़ा।
अध्याय 5: सृष्टि में हाहाकार और ब्रह्मदेव का वरदान
माँ ब्रह्मचारिणी की इस कठिन तपस्या से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। देवता, ऋषि-मुनि और सिद्ध पुरुष सब चकित रह गए। ऐसी तपस्या न किसी ने पहले कभी की थी और न कोई कर सकता था।
अंततः, पितामह ब्रह्मा जी उनके समक्ष प्रकट हुए और अत्यंत प्रसन्न होकर कहा— “हे देवी! आज तक किसी ने ऐसी कठोर तपस्या नहीं की। तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी। भगवान शिव तुम्हें पति के रूप में अवश्य प्राप्त होंगे। अब तुम अपनी तपस्या समाप्त कर अपने घर लौट जाओ, तुम्हारे पिता तुम्हें लेने आ रहे हैं।
अध्याय 6: आध्यात्मिक और वैज्ञानिक रहस्य
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स्वाधिष्ठान चक्र: योग मार्ग में दूसरे दिन की पूजा ‘स्वाधिष्ठान चक्र’ में स्थित होती है। यह चक्र मनुष्य की सृजनात्मकता और भावनाओं को संतुलित करता है।
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सीख: माँ ब्रह्मचारिणी का रूप हमें सिखाता है कि सफलता केवल इच्छा करने से नहीं, बल्कि कठिन परिश्रम और तप (Discipline) से मिलती है। जीवन के संघर्षों में विचलित न होना ही वास्तविक ‘ब्रह्मचर्य’ है।
अध्याय 7: पूजन विधि और प्रिय वस्तुएं
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रंग: इस दिन नारंगी (Orange) या पीला रंग पहनना शुभ माना जाता है, जो ऊर्जा और उत्साह का प्रतीक है।
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भोग: माँ को शक्कर (चीनी) और पंचामृत का भोग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इससे व्यक्ति को दीर्घायु प्राप्त होती है।
॥ माँ ब्रह्मचारिणी का स्तुति मंत्र ॥
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
भावार्थ: जिनके एक हाथ में अक्षमाला (जप की माला) और दूसरे हाथ में कमंडल है, ऐसी परम श्रेष्ठ ब्रह्मचारिणी माँ मुझ पर अपनी कृपा बनाए रखें।
॥ माँ ब्रह्मचारिणी की आरती – 1 ॥
जय जय माँ ब्रह्मचारिणी देवी। सुर नर मुनि सब करते सेवा। ब्रह्म ज्ञान की दात्री माता। भक्तों की तुम भाग्य विधाता। तपस्या का है रूप तुम्हारा। जग ने तुमसे तेज निहारा। दाहिने हाथ में माला सोहे। बाएँ हाथ कमंडल मोहे। जो भी तेरा ध्यान लगावे। सुख और शांति जीवन में पावे।
॥ माँ ब्रह्मचारिणी की आरती -2॥
जय ब्रह्मचारिणी माता,
जय ब्रह्मचारिणी माता।
तप की मूर्ति तुम हो,
जग में सुखदाता॥
जप माला कर धारण,
कमंडल सदा साथा।
श्वेत वस्त्र में शोभित,
तुम हो जग की माता॥
जय ब्रह्मचारिणी माता…
भक्तों के दुख हरती,
सुख-सम्पत्ति देती।
जो तुमको ध्याता है,
मनवांछित फल लेती॥
जय ब्रह्मचारिणी माता
